चर्चित ‘Kidney’ कांड में नया मोड़: सेशन कोर्ट में ‘विटनेस विंडो’ खोलने की अपील, लाइसेंस पर उठे गंभीर सवाल… ये है बड़ी वजह!
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पंजाब हॉटमेल, जालंधर। जालंधर के बहुचर्चित किडनी ट्रांसप्लांट मामले में करीब 11 साल बाद एक अहम कानूनी कदम उठाया गया है। पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने माननीय सेशन कोर्ट में ‘विटनेस विंडो’ दोबारा खोलने के लिए अपील दायर की है।

यह कदम आरोपी डॉक्टरों—डॉ. राजेश अग्रवाल और डॉ. संजय मित्तल—की मुश्किलें बढ़ा सकता है। इससे पहले यह विंडो अदालत द्वारा बंद कर दी गई थी और संबंधित जज ने निजी कारणों का हवाला देकर खुद को केस से अलग कर लिया था।
DRME की रिपोर्ट और NOC के बिना ट्रांसप्लांट का आरोप
दस्तावेजों के अनुसार, 2015 में मामले के उजागर होने पर DRME (डायरेक्टरेट ऑफ रिसर्च एंड मेडिकल एजुकेशन) के सुपरिंटेंडेंट सौदागर चंद ने पुलिस को बयान दिए थे कि कई किडनी ट्रांसप्लांट बिना NOC के किए गए।
उसी समय संबंधित डॉक्टरों का लाइसेंस रद्द हुआ था। DRME एक रेगुलेटरी बॉडी है जो ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लाइसेंस जारी/निरस्त करती है। अब बड़ा सवाल यह है कि जिस विभाग ने पहले लाइसेंस रद्द किया, उसी ने बाद में उन्हीं डॉक्टरों को दोबारा किडनी ट्रांसप्लांट का लाइसेंस कैसे जारी कर दिया?
विटनेस लिस्ट से नाम गायब, गवाही क्यों नहीं हुई?
पुलिस चालान में सौदागर चंद का नाम होने के बावजूद कथित तौर पर उन्हें विटनेस लिस्ट से बाहर कर दिया गया। परिणामस्वरूप उनकी अहम गवाही अब तक अदालत में दर्ज नहीं हो सकी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि DRME अधिकारी की गवाही होती है, तो केस की दिशा बदल सकती है। सूत्रों के मुताबिक, अपनी रिपोर्ट में उन्होंने जरूरत पड़ने पर अदालत में बयान देने की तत्परता भी जताई थी।
फिर 11 साल बाद भी गवाही क्यों नहीं हुई—यह प्रश्न अब और तीखा हो गया है।
TOHO एक्ट के तहत दोषी पाए डॉक्टरों को लाइसेंस कैसे?
मामले में यह भी चर्चा है कि आरोपित डॉक्टर TOHO एक्ट (Transplantation of Human Organs Act) के तहत दोषी पाए गए थे। DRME के नियमों के अनुसार, यदि कोई TOHO एक्ट का पालन नहीं करता, तो उसे लाइसेंस नहीं मिलना चाहिए।
ऐसे में सर्वोदय अस्पताल में दोबारा ट्रांसप्लांट की अनुमति किन नियमों के तहत दी गई—यह जांच का विषय बन गया है।
जनता के सवाल और आगे की राह
दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कई अहम गवाहों के बयान दर्ज न होना, विटनेस विंडो का जल्दबाज़ी में बंद होना, और प्रॉसिक्यूशन की अर्जियों का दो बार खारिज होना—इन सबने आम जनता में सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब सेशन कोर्ट में दायर अपील से उम्मीद जगी है कि जरूरी गवाहों के बयान दर्ज होंगे और मामले की परतें खुलेंगी।
