आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: बच्चे को काट रहे, लोग मर रहे हैं”; तो इनकी भी काउंसलिंग…! पढ़ें जज-वकील-पीडि़त और NGO’S के तर्क
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पंजाब हॉटमेल, नई दिल्ली। देशभर में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और रैबीज के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम और तीखी सुनवाई हुई।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की स्पेशल बेंच ने साफ कहा कि यह मुद्दा सिर्फ पशु प्रेम या विरोध का नहीं, बल्कि आम नागरिकों—खासकर बच्चों और बुजुर्गों—की जान से जुड़ा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह पीड़ितों, पशु प्रेमियों और विरोध करने वालों सभी की बात सुनेगा। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि जब भी वह मंदिरों या सार्वजनिक स्थानों पर गए, उन्हें कभी किसी कुत्ते ने नहीं काटा।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा—“आप खुशकिस्मत हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि लोगों को काटा जा रहा है, बच्चों को काटा जा रहा है और लोग मर रहे हैं।”
कोर्ट ने दो टूक कहा कि समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह मामला 28 जुलाई 2025 को उस समय सामने आया था, जब दिल्ली में आवारा कुत्तों के काटने से रैबीज फैलने को लेकर एक मीडिया रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।
अब तक इस मामले में पांच बार सुनवाई हो चुकी है। 6 जनवरी को दो वकीलों ने इस संबंध में नई याचिकाएं दायर की थीं, जिस पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “इंसानों से जुड़े मामलों में भी इतने आवेदन नहीं आते।”
कोर्ट रूम की लाइव सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि गेटेड या क्लोज्ड कम्युनिटी में कुत्तों को रखना या न रखना वहां रहने वालों का फैसला होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर 90% निवासी इसे खतरनाक मानते हैं और 10% विरोध करते हैं, तो लोकतांत्रिक तरीके से निर्णय होना चाहिए।
वहीं, कपिल सिब्बल ने आवारा कुत्तों की नसबंदी और उन्हें उसी इलाके में वापस छोड़ने की मौजूदा प्रक्रिया का समर्थन किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने व्यंग्य करते हुए कहा—“अब बस कुत्तों को काउंसलिंग देना बाकी है, ताकि वे दोबारा काटें नहीं।”
कोर्ट ने यह भी पूछा कि सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में होगा, इसकी पहचान कैसे की जाएगी, क्योंकि खतरा सिर्फ काटने का नहीं, बल्कि सड़क हादसों का भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने NGO, शेल्टर होम, एनिमल वेलफेयर बोर्ड (AWB) की SOP और वैज्ञानिक तरीकों पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानवीय रवैये के साथ-साथ नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है और किसी एक पक्ष के दबाव में आकर आम लोगों की जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती।
