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श्रीनगर में भव्य कीर्तन दरबार और नगर कीर्तन: गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर ऐतिहासिक समारोह, महान नगर कीर्तन 22 को पहुंचेगा पंजाब

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मुख्यमंत्री भगवंत मान, आप सुप्रीमो केजरीवाल, दीपक बाली और मंत्री मोहिंदर भगत हुए नतमस्तक, सरकार ने की विशेष तैयारियां

पंजाब हॉटमेल, श्रीनगर/पंजाब। श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस के पावन अवसर पर श्रीनगर स्थित गुरुद्वारा छेवीं पातशाही में आज एक भव्य और आध्यात्मिक माहौल से भरपूर कीर्तन दरबार का आयोजन किया गया।

इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान और आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सिख संगत के साथ सिर नवाया और गुरु साहिब की अमर शिक्षाओं को स्मरण किया।

इस दौरान पंजाब सरकार के कैबिनेट मंत्री मोहिंदर भगत, आप के महासचिव दीपक बाली और विधायक कुलदीप सिंह धालीवाल भी उपस्थित रहे, जिससे कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ गई।

अरविंद केजरीवाल ने दिया गुरु साहिब के सार्वभौमिक संदेश को अपनाने का आह्वानसमारोह को संबोधित करते हुए अरविंद केजरीवाल ने गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षाओं—प्रेम, मानवता, धार्मिक स्वतंत्रता, सहनशीलता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व—को पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायी बताया।

उन्होंने कहा कि गुरु साहिब का जीवन और दर्शन आज भी मानवता को राह दिखाने वाला प्रकाश स्तंभ है।उन्होंने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में पंजाब सरकार ने इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवसर के लिए अत्यंत गरिमामयी व्यवस्थाएँ की हैं।

मुख्यमंत्री मान ने किया गुरु साहिब के अद्वितीय बलिदान का स्मरणमुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि हक, सत्य और धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी द्वारा दिया गया सर्वोच्च बलिदान भारत के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है।

उन्होंने कश्मीरी पंडितों के महान धर्मरक्षक पंडित कृपा राम जी को श्रद्धांजलि देते हुए बताया कि वे श्रीनगर से लगभग 65 किलोमीटर दूर मट्टन कस्बे के निवासी थे। उनकी अगुवाई में कश्मीरी पंडितों ने अपने धर्म की रक्षा हेतु गुरु साहिब से सहायता की गुहार लगाई थी।

कश्मीरी पंडितों की नगर कीर्तन में भागीदारी—भाईचारे की अनूठी मिसालमुख्यमंत्री ने गर्वपूर्वक कहा कि श्रीनगर से निकाले जा रहे नगर कीर्तन में कश्मीरी पंडित भी शामिल होंगे—जो आपसी सद्भाव, एकता और भाईचारे का अद्वितीय प्रतीक है। उन्होंने रेखांकित किया कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता, सत्य और न्याय के लिए था।

✨ खालसा पंथ की नींव और बलिदान की विरासतभगवंत सिंह मान ने बताया कि गुरु साहिब की शहादत के 24 वर्ष बाद, वर्ष 1699 में श्री आनंदपुर साहिब की पावन धरा पर खालसा पंथ का उदय हुआ, जिसने विश्व इतिहास में एक नई क्रांति और साहस की परंपरा को जन्म दिया।

उन्होंने आगे कहा कि दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

उन्होंने कहा, “बलिदान की भावना हमारे खून में है—यह विरासत हमें गुरु अर्जुन देव जी, गुरु तेग बहादुर जी और गुरु गोबिंद सिंह जी से मिली है। पंजाबी अपनी गौरवशाली विरासत पर सदैव गर्व करते हैं।”

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